गेहू की खेती कैसे और कब

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कुमार गौरव/पूर्णिया
जिले में श्रीविधि से गेहूं की खेती कारगर साबित हो रही है। अगर तुलना करें तो इसमें परंपरागत खेती से बुआई का खर्च चौथाई से भी कम हो रहा है और उपज डेढ़ गुना मिल रही है लेकिन इस खेती में बीज को उपचारित कर बुआई की विधि थोड़ी अलग है। रसायनिक खादों के इस्तेमाल से मुक्ति मिल रही है। अब तो किसान बुआई के लिए कतार से कतार और पौधे से पौधे के बीच एक निश्चित दूरी रखने के लिए कोनोवीडर मशीन की सहायता ले रहे हैं। यह खेती छोटे किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। जिले में इस विधि के प्रति किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विभाग की ओर से विशेष पहल की जा रही है। Read : गेहू की खेती कैसे और कब about गेहू की खेती कैसे और कब

मिर्च के हानिकारक रोग क्या है?

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मिर्च के हानिकारक रोग

मिर्च में सबसे अधिक हानि पत्तियों के मुडऩे से होती है जिसे विभिन्न स्थानों में कुकड़ा या चुरड़ा-मुरड़ा रोग के नाम से जाना जाता है। यह रोग न होकर थ्रिप्स व माइट के प्रकोप के कारण होता है। थ्रिप्स के प्रकोप के कारण मिर्च की पत्तियां ऊपर की ओर मुड़ कर नाव का आकार धारण कर लेती है। माइट के प्रकोप से भी पत्तियां मुड़ जाती है परन्तु ये नीचे की ओर मुड़ती हैं। मिर्च में लगने वाली माइट बहुत ही छोटी होती है जिन्हें साधारणत: आंखों से देखना सम्भव नहीं हो पाता है। यदि मिर्च की फसल में थ्रिप्स व माइट का आक्रमण एक साथ हो जाये तो पत्तियां विचित्र रूप से मुड़ जाती हैं। इसके प्रकोप से फसल के उत्पादन में बहुत Read : मिर्च के हानिकारक रोग क्या है? about मिर्च के हानिकारक रोग क्या है?

आवला की खेती के फायदे

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आंवले की खेती-​ करने का तरीका :आंवले में पौषक तत्वों की मात्रा अधिक पाई जाती है | यदि इसकी खेती करते है तो इसका उत्पादन भी बहुत अधिक मात्रा में होता है | आंवले को एक अद्वितीय औषधि गुणों वाला पौधा भी कहा जाता है | इसमें शर्करा और भी अन्य पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा पाई जाती है | यह विटामिन सी का प्रमुख स्त्रोत है | इसके प्रयोग करने से मानव के शरीर में विटामिन सी की कमी पूरी हो जाती है | आंवला भारत का प्रमुख पौधा माना जाता है | आंवले के ताज़े रस और इसके फल को धूप में सुखाकर प्रयोग किया जाता है | आंवले को दोनों प्रकार से प्रयोग किया जाता है | हमारे भारत में आयुर्वेदिक औषधि का Read : आवला की खेती के फायदे about आवला की खेती के फायदे

ऐसे करें अमरूद की बागवानी

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अतिसघन बागवानी करते समय मुख्य पौधे को सबसे पहले 70 सेंटीमीटर की ऊंचाई से काट दें। उसके बाद दो-तीन माह में पौध से चार-छह सशक्त डालियां विकसित होती हैं। इनमें से चारों दिशाओं में चार डालियों को सुरक्षित कर बाकी को काट देते हैं, ताकि पौधे का संतुलन बना रहे। इससे मात्र छह माह में ही अमरूद फल देने लगता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक प्रारंभिक अवस्था में हर पेड़ में तीन-चार फल ही रखें, बाकी फलों को छोटी अवस्था में तोड़ दें। इससे नन्हें पौधों पर ज्यादा बोझ नहीं आएगा।

प्रति एकड़ लागत (रुपए में)

- 1600 पौधे की लागत 48 हजार

- ट्रैक्टर से दो बार जोताई 4 हजार Read : ऐसे करें अमरूद की बागवानी about ऐसे करें अमरूद की बागवानी

लीची की उन्नत तकनीक खेती

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लीची एक तकनीक है जिसे वैज्ञानिक नाम से बुलाते हैं, जीनस लीची का एकमात्र सदस्य है। इसका परिवार है सोपबैरी। यह ऊष्णकटिबन्धीय फ़ल है, जिसका मूल निवास चीन है। यह सामान्यतः मैडागास्कर, भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, दक्षिण ताइवान, उत्तरी वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका में पायी जाती है।
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