पपिते की खेती

villagedevelopment's picture
पपिते की खेती

पपीता की खेती करने से आपको कम खर्च में ज्यादा benefit हो सकता है। खाने में स्‍वादिष्‍ट लगने वाला फल पपीता में विटामिन ए, सी और इ पाया जाता है। पपीते में  पपेन नामक पदार्थ पाया जाता है जो अतिरिक्त चर्बी को गलाने के काम आता है। पपीता सबसे कम समय में तैयार होने वाला फल है जिसे पके तथा कच्चे दोनों रूप में प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसकी खेती कि लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। 

वैसे तो पपिते की खेती भारत में किसी भी राज्य में की जा सकती है परन्तु छत्तीसगढ़ के किसानो को पपीते की खेती करने की सलाह दी जाती है क्योंकि वहां का तापमान  पपीते के मुताबिक है। पपीता के सफल खेती के लिए 10 डिग्री से. से 40 डिग्री से. तक का तापमान उपयुक्त होता है ।

अधिक ठण्ड से खेती को नुकसान पंहुचा सकता है जिससे पौधा और फल दोनों ख़राब हो सकता है। देश के कई राज्यों में जैसे  बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश , पंजाब , हरियाणा,और  दिल्ली में इसकी खेती कि जा रही है । किसान स्वयं और राष्ट्र को आर्थिक दृष्टी से लाभांवित कर सकते है इसके लिए तकनिकी रूप में निम्न बातो का ध्यान रखना चाहिए 

मिट्टी का चयन -पपीता लगाने के लिए भूमि का अच्छे से त्यारी करना चाहए, कृषि वैज्ञानिक पपीता के अच्छी उपजाव के लिए और अधिक उत्पादन के लिए बालुई दोमट मिट्टी की सलाह देते है जिसमे जल निकास कि व्यवस्था अच्छी हो । भूमि की अच्छे से जुताई कर लेना चाहए।गहरा जुताई करने के बाद खेत से सारे खर-पतवार को अच्छे से साफ़ कर लेना चाहए

पपीता के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है। जिस जगह पर नर्सरी हो उस  जगह कि अच्छी जुताई करके समस्त कंकड़  पत्थर निकाल कर साफ कर देना चाहिए ।

बीज कि मात्रा एक हे.के (hectare) लिए 500 ग्राम काफी होती है बीज अच्छे से पका हुआ , अच्छी तरह सुखा हुआ और शीशे के बोतल में रखा हो जिसका मुहं ढका  हो और 6 महीने से पुराना न हो। संकर (hybrid) किस्म की बिजे उत्पादकता और गुणवता दोनों ही तरह से अच्छा होता है। ऐसा माना जाता है की संकर बीजो से उत्पन सभी पौधे जादातर मादा या उभयलिंग होता है।</p>

पपीते के दो पौधों के बिच कम से कम 2 मीटर की दुरी होनी चाहए। पपीता बोने के लिए त्यार उचित माप के गढ़ढ़ो के मिटटी को 15 से 20 दिनों के लिए खुले हवा और धुप में रखने के बाद उसमे गोबर की खाद 10 kg, सुपर फास्फेट 200g, म्यूरेट ऑफ पोटाश 75g, और एन्डोसल्फान 50g,मिलाकर भर देना चाहये।अच्छे से पपीता का रोपन हो जाने से 5 से 6 महीने में फल आने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।

किट पतंग से बचाव

जैसा की हम जानते है अगर किसी भी पेड़ या पौधे में कीड़े मकोड़े लग जाये तो वो पुरे पेड़ पौधे को नष्ट कर देता है। आमतौर पर माना जाता है की पपीता  में जादा कीड़े मकोड़े नहीं लगते है लेकिन फिर भी कभी कभी अगर जादा गर्मी या जादा ठंड होती है तो उसकी वजह से फल खराब हो सकता है। इसलिए किसानो के लिए ये जानना बहुत हीं जरुरी है की पपीता में  कीड़े मकोड़े , fungus , या फिर virus, किस कारण से लगते है और उनसे बचने की विधि क्या है।

अपने पपीते के फसल को वेज्ञानिक तरीके से बचा सकते है

 

लाल मकड़ी किट

माहू किट

 

आद्रगलन किट- ये एक fungus दवारा होने वाला रोग है। इस रोग में पौधे का तना प्रारंभिक रूप से गल जाता है। इस रोग से बचाव के लिए बिज का भली भांती उपचारित होना जरुरी है।</li>

मोज़ेक किट – ये पपीते का virus से होने वाला एक रोग होता है। इससे बचने के लिए प्रभावित पौधे को उखाड़ कर फेंक देना चाहए।

 

पपीते की खेती की कुल प्रतिशत में से केवल 0.08% हीं निर्यात(export) किया जाता है बाकीं अपने ही देश के उपयोग में लाई जाती है। अगर आप papita ke kheti के बारे में सोच रहे है तो आप इसी विधि से खेती करे। इस खेती में आपको बहुत आमदनी होगी।

 ध्यान रहे की उचित समय में पपिते की फल को तोड़ कर उसे सब्जी मंडी (sabji mandi) में बेच दिया करे ताकि फल ख़राब होने से पहले हे बिक जाये .