संकर कपास की कृषि कार्यमाला

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कपास
  • यह गर्व का विषय है कि हम संकर कपास बीज उत्पादन में वि¶व में अग्रणी हैं। संकर कपास के जनक डा0 सी टी पटेल द्वारा वि¶व को संकर कपास एच -4 की सौगात दी गई । उत्तरोत्तर ¶ाोध द्वारा परिष्कृत की गई जातियों की वजह से वर्ष 2001-02 में हमारे प्रदे¶ा में कपास के अंतर्गत कुल पांच लाख पचास हजार हैक्टेयर क्षेत्र में से लगभग 35 प्रति¶ात संकर कपास बोया गया। अनुमानत: हमारी आव¶यकता लगभग 9 से 10 लाख किलो संकर बीज प्रतिवर्ष है।
    वर्तमान में बीज उत्पादन एवं बीज विक्रय नीति को परिष्कृत कर उच्च गुणवत्ता का बीज पर्याप्त मात्रा में, समय पर व उचित मूल्य में उपलब्ध कराना अत्याधिक आव¶यक है।
  •   अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ दोमट हल्की से मध्यम गहरी काली मिट्टी कपास बीज उत्पादन के लिए उपयुक्त होती है। भूमि में एक प्रति¶ात तक ढाल हो, तो यह संकर कपास बीज उत्पादन के लिए अधिक उपयुक्त होती है तथा पिछले फसल काल में कपास की फसल नहीं लगी हो।
  • संकर कपास बीज उत्पादन के लिए निम्न जातियां प्रमुख हैं। इन किस्मों में से आव¶यकतानुसार चयन करें ।
क्र0 किस्म मादा नर
1 जे0के0एच0व्हाई-2 खण्डवा- 2
( एम0 व्ही )
रीवा बी' 50
( एस0 )
2 जे0के0एच0व्हाई-2          विक्रम ( एस0 ) रीवा बी' 50
( एस0 )
3 एच0-4        गुजरात- 67 अमेरिकन नेक्टरलेस
4 एच0-6       जी0कॉट- 100  जी0कॉट- 10
5 एच0- 8        जी0कॉट- 10 सूरत ड्वार्फ
6 एच0- 10     बी0सी0-68-2    एल0आर0ए0- 51-66
संकर कपास के पैत्रक बीजों की पहचान - संकर कपास के पैत्रकों के प्रमुख लक्षण निम्नानुसार हैं :-
 जे0के0एच0वाय-1
क्र0 प्रमुख लक्षण मादा खण्डवा- 2 ( एम वी ) नर रेवा (बी-) 50 ( एस )
1 पौधे की उचाई          100 से 125 से0मी0 मध्य में 75 से 100 से0मी0
2 पत्तों का आकार प्रकार          अधिक कटाव नुकीली मध्यम आकार रोंयेदार : होने से रंग मटमैला कम कटाव चौड़ी, गहरी, हरी

चिकना : , चमकदार

3 पौधे का आकार        झाड़ी नुमा असीमित वृद्धि सीमित वृद्धि, घना
4 फूल आने का समय          60 से 70 दिन 60 से 65 दिन
5 पराग कणों का रंग        मलाई जैसा सफेद बफ : गहरा बसन्ति पीला
6 पंखुड़ी का रंग         हल्का पीला सफेद
7 पकने की अवधि          160 दिन 160 दिन
 
संकर कपास किस्म - जे0के0एच0-2
क्र0 प्रमुख लक्षण मादा खण्डवा- 2 ( एम वी ) नर रेवा (बी-) 50 ( एस )
1 पौधे की उचाई         75 से 90 से0मी0 75 से 110 से0मी0
2 पत्तों का आकार प्रकार    

 

हल्की हरी एवं चौड़े पत्ते

हल्के रोंये युक्त
   

कम कटाव चौड़ी, गहरी, हरी

चिकना, चमकदार

3 पौधे का आकार घना असीमित वृद्धि     सीमित वृद्धि, घना
4 फूल आने का समय 50 से 55 दिन     60 से 65 दिन
5 पराग कणों का रंग मख्खनी से पीला      गहरा बसन्ति पीला
6 पंखुड़ी का रंग हल्का पीला      हल्का पीला
7 पकने की अवधि 160 दिन     160 दिन
 
एच0-4
क्र0 प्रमुख लक्षण मादा खण्डवा- 2 ( एम वी ) नर रेवा (बी-) 50 ( एस )
1 पौधे की उचाई 110 से 150 से0मी0     50 से 75 से0मी0
2 पत्तों का आकार प्रकार नाड़ी पर ग्रंथी होती है।

मोटी 3 से 5 कटाव
   

हरी चिकनी नाड़ी पर ग्रंथी

नहीं होती ।

3 पौधे का आकार झाड़ी नुमा     मध्यम वृद्धि वाला
4 फूल आने का समय 85 से 90 दिन     50 से 55 दिन
5 पराग कणों का रंग बफ कलर     मखनी सफेद
6 पंखुड़ी का रंग सफेद     हल्का सफेद
7 पकने की अवधि 280 दिन से 300 दिन     140 से 150 दिन
 
एच0 -6
क्र0 प्रमुख लक्षण मादा खण्डवा- 2 ( एम वी ) नर रेवा (बी-) 50 ( एस )
1 पौधे की उचाई 100 से 110 से0मी0     100 से 120 से0मी0
2 पत्तों का आकार प्रकार     चिकनी सतह, चौड़ी गहरी हरी     रोयेदार, हरी, नुकीली मध्यम आकार
3 पौधे का आकार सीधी बढ़ने वाली     खुली बढ़वार
4 फूल आने का समय 60 से 65 दिन     60 से 65 दिन
5 पराग कणों का रंग पीला     सफेद
6 पंखुड़ी का रंग हल्का पीला     हल्का पीला
7 पकने की अवधि 240 से 250 दिन     150 से 170 दिन
 
एच0- 8
क्र0 प्रमुख लक्षण मादा खण्डवा- 2 ( एम वी ) नर रेवा (बी-) 50 ( एस )
1 पौधे की उचाई 120 से 140 से0मी0     100 से 120 से0मी0
2 पत्तों का आकार प्रकार कटाव, मध्यम, रोंयेदार     कम कटाव, कम रोंये
3 पौधे का आकार खुली वृद्धि वाला     कम ऊचाई एवं घना
4 फूल आने का समय 60 से 70 दिन     50 से 55 दिन
5 पराग कणों का रंग बफ     बफ
6 पंखुड़ी का रंग पीला     सफेद
7 पकने की अवधि 150 से 170 दिन     140 से 160 दिन
नोट:- मादा की अंडा¶ाय पर अनेकों स्पॉट बिन्दु होते हैं
 
जे0के0एच0वाय-1
क्र0 प्रमुख लक्षण मादा खण्डवा- 2 ( एम वी ) नर रेवा (बी-) 50 ( एस )
1 पौधे की उचाई 120 से 140 से0मी0     100 से 125 से0मी0
2 पत्तों का आकार प्रकार छोटा, मध्यम, रोंयेदार     छोटा, मध्यम, रोंयेदार
3 पौधे का आकार खुली वृद्धि वाला     मध्यम ऊचाई वाला
4 फूल आने का समय 60 से 70 दिन     60 से 65 दिन
5 पराग कणों का रंग पीला     पीला
6 पंखुड़ी का रंग मखनी     मखनी
7 पकने की अवधि 180 से 190 दिन     170 से 180 दिन
नोट :-मादा पौधे जब 20 से 22 दिन के हों तो इनके पत्तों के किनारे एवं तनों पर पिगमेंटे¶ान स्पष्ट दिखाई देता है।

कपास की उपयुक्त किस्मों का प्रमाणित बीज ही क्रय करके बोना चाहिये। प्रमाणित बीज उत्पादन की निम्नानुसार श्रेणियाँ हैं :-

प्रजनक बीज

प्रजनक बीज कृषि वि¶वविद्यालय के अधिकृत प्रजनकों की देखरेख में केन्द्रक बीज (न्यूक्लियस बीज ) से उत्पादित किया जाता है। प्रजनक बीज के लेबल का रंग सुनहरा पीला होता है। जिस पर फसल किस्म जाति इत्यादि, विवरण के साथ संबंधित अधिकृत प्रजनक के हस्ताक्षर व मोहर होती है।

आधार बीज

आधार बीज का उत्पादन प्रजनक बीज से होता है। इसका प्रमाणीकरण बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप होने पर किया जाता है। आधार श्रेणी के बीज की बोरियों पर सफेद रंग का टेग लगा होता है। इस टेग पर प्रमाणीकरण संबंधी विवरण के साथ अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर व मोहर लगी होती है।

प्रमाणित बीज

प्रमाणित बीज का उत्पादन आधार बीज से होता है। इसका प्रमाणीकरण भी बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप होने पर किया जाता है।प्रमाणित श्रेणी के बीज की बोरियों पर नीले रंग का टेग लगा होता है। जिस पर प्रमाणीकरण संबंधी विवरण के साथ अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर व मोहर लगी होती है।

बीज दर

नर की 100 ग्राम एवं मादा की 200 ग्राम बीज की मात्रा एक एकड़ के लिये पर्याप्त है।

बोनी की विधि
  • यदि खेत में ढलाव कम हो, भूमि गहरी हो व पौध बढ़वार अधिक हो तो कतार से कतार की दूरी 150 से 180 से0मी0 रखना चाहिये। एक स्थान पर एक फीट के अंतर से दो पौधे लगाना चाहिये।
  • कतार से कतार की दूरी 150 से 180 से0मी0 रखना चाहिये।
  • पौधे से पौधे की दूरी (150 सेमी - 180 सेमी)
  • ऐसे खेत जहाँ ढाल 0.5 से 1 प्रति¶ात हो तथा भूमि हल्की हो जिसमें पौध बढ़वार कम होती हो, वहां किस्म अनुसार निम्नानुसार दूरी रखें :-
    क्र0 किस्म कतार से कतार की दूरी पौधे से पौधे की दूरी
    1 एच - 8 120 सेमी0 90 सेमी0
    2 एच - 6, एच - 10,

    जे के एच - 1,

    जे के एच - 2,

    150 सेमी0

    150 सेमी0

    150 सेमी0

    120 सेमी0

    120 सेमी0

    120 सेमी0

  • मध्यम पौध बढ़वार वाली कम ढॉल (0.5 प्रति¶ात से कम ) की मध्यम गहरी भूमि में कतार से कतार की दूरी 150 सेमी0 व पौध से पौध की दूरी 120 से 150 सेमी0 किस्म अनुसार रखें ।
  • सभी विधियों में यदि पानी की उपलब्धता सुनि¶िचत हो तो खेत में सीधी बुआई करना पॉलीथीन बैग द्वारा रोपण तैयार करने से अधिक उपयुक्त होती है।
  • पॉलीथीन बैग में रोपण तैयार करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि नर मादा पृथक-पृथक रखे जावें व नामांकित हों ।
    रोपणी सीधे सूर्यप्रका¶ा के सम्पर्क में न आवे।झारे से प्रतिदिन हल्का पानी देना चाहिये।प्रत्यारोपण करते समय पॉलीथीन बैग पूरी तरह काटकर इस तरह निकाल देवें कि जड़ टूटे फूटे नहीं ।
    बोने का समय :- किस्मवार बोने का उपयुक्त समय निम्नानुसार है ।
    किस्म बुआई का समय खेत में सीधी बुआई पॉलीथीन बैग में
    मादा

    (प्रति¶ात)

    नर

    (प्रति¶ात)

    मादा

    (प्रति¶ात)

    नर

    (प्रति¶ात)

    एच - 6, एच - 8, एच -10, जे के एच - 1, जे के एच - 2,एनएचएच - 44 मई प्रथम सप्ताह से 15 मई तक 100 70 30 8 से 10 दिन बाद 100 50 50 8 से 10 दिन बाद
    एच - 4 15 अप्रेल से 1 मई 100 50 25 25 8 से 10 दिन बाद 100 50 50 8 से 10 दिन बाद
पृथक्करण दूरी

नर एवं मादा की खेत में सीधी बुआई करते समय अथवा रोपणी लगाते समय निम्नानुसार पृथक्करण दूरी रखी जाना सुनि¶िचत कर लेवें :-

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खाद एवं उर्वरक
जैविक खाद

जैविक खाद के उपयोग से भूमि में प्रमुख पोषक तत्वों एवं सभी सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है। जो पौधों की वृद्धि व उत्पादन बढ़ाने के लिये आव¶यक है, अतएव निम्नानुसार विधियों से तैयार जैविक खाद का उपयोग करें।

नाडेप विधि

खेतों के उपलबध कचरे / बॉयोमास, गोबर, छनी हुई भुरभुरी मिट्टी एवं पानी के मिश्रण को सामान्यत: 10 /6 /3 फीट के नाडेप टेंक में 3 से 4 माह तक भरकर रखने के बाद अच्छी पकी हुई भुरभुरी, भूरे रंग की उत्तम जैविक खाद तैयार हो जावेगी। एक हैक्टेयर के लिये इस तरह की 25 से 26 Ïक्वटल नाडेप खाद पर्याप्त होगी।

वर्मी कम्पोस्ट

 

 

वर्मी कम्पोस्ट के लिये एक 100 वर्गफुट की नर्सरी पर गोबर खाद फैलाकर उस पर 4 से 5 हजार केंचुओं को लगभग एक माह तक रखने के बाद इस नर्सरी बेड पर 2 इंच कूड़े कचरे की नम तह बना दें। 42 वें दिन नमी देना बंद कर दें। इस प्रकार 50 से 60 दिन में केंचुओं की बढ़ी संख्या से एक या दा नये बेड बना सकते हैं। इस नर्सरी बेड में लगभग डेढ़ माह में चाय पावडर की तरह भुरभुरी मिट्टी की वर्मी कम्पोस्ट खाद बन जाती है। इस खाद की 50 Ïक्वटल मात्रा एक हैक्टेयर के लिये पर्याप्त होगी।

नाडेप फॉस्फो कम्पोस्ट

नाडेप फॉस्फो कम्पोस्ट नाडेप विधि का ही उन्नत रूप है। इसमें केवल इतना अंतर है कि नाडेप टेंक में कचरे / बॉयोमास, गोबर एवं छनी हुई भुरभुरी मिट्टी के साथ प्रत्येक परत पर 12 से 15 किलो रॉक फॉस्फेट फैला दिया जाता है। यह खाद भी 3 से 4 माह में तैयार हो जावेगी। इसकी 25 से 26 Ïक्वटल मात्रा एक हैक्टेयर के लिये पर्याप्त होगी।

बॉयो गैस स्लरी

 

 

बॉयो गैस संयंत्र से निकली पतली स्लरी को खेत में नालियाँ बनाकर या सिंचाई के पानी में मिलाकर देने से फसल उत्पादन मे 10 से 20 प्रति¶ात तक वृद्धि हो सकती है। यह खाद सिंचाई रहित खेती में एक हैक्टेयर में 50 Ïक्वटल व सिंचाई वाली खेती में 100 Ïक्वटल प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होगी।

नोट : भली भांति सड़ी हुई नाडेप खाद या कम्पोस्ट की मात्रा प्रत्यारोपण करने की स्थिति में प्रति बिन्दु

25 से 30 सेमी0 गड्ढ़ा कर दो या तीन मुट्ठी का बेसल डोज देवें । 9.2 रासायनिक खाद: आव¶यक होने पर पौधों के संतुलित पोषण हेतु रासायनिक खाद की मात्रा निम्नानुसार देनी चाहिये:

  • नत्रजन - 332 से 440 किलो यूरिया
  • फास्फोरस - 460 से 624 किलो सुपर फॉस्फेट
  • पोटा¶ा - 060 से 084 किलो म्यूरेट ऑफ पोटा¶ा

खाद देने का तरीका: रासायनिक खाद आव¶यकता होने पर निम्न विधि से देवें ।

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खाद देते समय फास्फोरस एवं पोटा¶ा खाद कॉलम पद्धति से देना ज्यादा लाभप्रद होता है । इस विधि में खाद देते समय पौधे से 15 से 20 सेमी0 दूरी पर किसी यंत्र से तिरछा गड्ढ़ा कर खाद देवें। इससे खाद पौधे की जड़ों को सीधा मिलता है। दूसरी बार खाद देते समय गड्ढ़ा विपरीत दि¶ाा में बनाना चाहिये।

सिंचाई

वर्षा ऋतु में फसल में वर्षा का अंतराल अधिक होने की स्थिति में आव¶यकतानुसार सिंचाई करें। वर्षा ऋतु के उपरांत भूमि के प्रकार अनुसार फसल में सिंचाई आव¶यक होंने पर की जावे। अक्टूबर एवं नवंबर माह में सिंचाई का वि¶ोष ध्यान रखना चाहिये।

संकरण विधि एवं आव¶यक तकनीकी जानकारी

संकर कपास का बीज नर व मादा पौधों के उचित अवस्था में संकरण से तैयार होता है, यह विधियाँ निम्नानुसार हैं:-

नर नपुंसीकरण

मादा पौधों के पुष्प से नर भाग अलग करने की क्रिया को नर नपुंसीकरण कहते हैं, यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्रिया है जिसका बीज की गुणवत्ता, मात्रा एवं बीजोत्पादन कार्यक्रम की सफलता से सीधा संबंध है। इस कार्य को करते समय निम्नानुसार सावधानिया बरतनी चाहिये।

समय: ¶ााम तीन बजे से छ: बजे तक किसी भी द¶ाा में यह कार्य समय के पूर्व ¶ाुरू नहीं करना चाहिये, क्योंकि जिन कलियों को समय से पहले छील लिया जाता है। उनके सिरे सूखने की संभावना रहती है। जिससे कम मात्रा में बीज बनता है।

नर नपुंसीकरण में सावधानियाँ:
  • प्रत्येक मजदूर को अधिकतम 500 से 600 लेबल से अधिक नहीं देना चाहिये, ताकि वह जल्दी करने की वजह से अन्य गलतियाँ कम से कम करे।
  • लेबल गिने हुये लाल रंग के अच्छे गुणवत्ता के होने चाहिये।
  • मजदूर द्वारा नर कण निकालते समय उसका नाखून ओव्हरी की झिल्ली को क्षतिग्रस्त न करे।
  • नर परागकण छिली हुई कलियों पर, पत्तों पर न गिरें और न ही छूटे। प्रत्येक मजदूर को एक झोला देना चाहिये। ताकि वह पृथक किये गये नर परागकण उसमें इकट्ठा कर मदा प्लॉट से दूर नष्ट करे।
  • कली पकड़ने का तरीका इस प्रकार होना चाहिये कि कली पकड़ते समय वह उसके मुख्य ¶ााखा से न पकड़ी जावे। कली का सिरा बांये हाथ के अंगूठे व मध्यमा से इस प्रकार पकड़ें कि वह हिले नहीं।
  • नर नपुंसीकरण के तुरंत प¶चात लेबल पहनावें।

परागण: परागण का कार्य सावधानी पूर्वक करना बीज की ¶ाुद्धता के लिए अनिवार्य है इस हेतु निम्नानुसार सावधानियां रखें:-

कली का चुनाव:

ऐसी कली जो दूसरे दिन खिलने वाली हो का चुनाव किया जाना चाहिये। ऐसी कली जिनका सिरा ऊपर से हल्का खुल जावे यह सर्वथा उपयुक्त होती है।

छोटी कली को किसी भी द¶ाा में छीलना नहीं चाहिये अन्यथा ग्राह अण्डाणू की कमी से कम मात्रा में बीज बनते हैं ।

समय:

 

  • परागण का उपयुक्त समय सुबह 9 से 11 बजे का है। उक्त समय का तात्पर्य ग्राह वृतिकाग्र से होता है। इस समय में अधिक से अधिक मादा अण्डाणु निषेचित होते है। जिसके फलस्वरूप अधिक मात्रा में बीज बनता है। समय पूर्व या देरी से परागण करने पर बीज में संदूषण की संभावनायें बढ़ जाती हैं। अत: समय का ध्यान रखें ।

 

 

  • ऐसे मौसम में जब सुबह अधिक ठंडक हो, बारि¶ा हो रही हो तो परागण का कार्य देरी से प्रारंभ करना चाहिये।

 

 

  • मौसम की विपरीत परिस्थितियों की वजह से यदि 12.30 तक परागण संभव न हो तो परागण अगले दिन करना चाहिये।

 

नर कली तोड़ना:

ऐसी नर कलियां जिनका पुष्प खिलने वाला हो, उसे सुबह 5 से 6:30 तक तोड़ लेवें। तत्प¶चात ऊपरी आवरण को छीलकर अलग कर देवें एवं कलियों को ट्रे में व्यवस्थित जमा देवें। नर कलियों की संख्या मादा नर नपुंसीकरण किये गये कलियों की संख्या की आधी या एक तिहाई होनी चाहिये। प्रत्येक ट्रे को ऐसे स्थान पर जहां हवा कम चलती हो सूर्य प्रका¶ा सीधा लगता हो व अन्य संदूषण के कारक न हों वहां पर पराग आने के लिये रखना चाहिये।

 

 

 

http://www.mp.gov.in/spt/hy-cotton

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