आड़ू की खेती की जानकारी

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आडू के  पौधे उपजाऊ  भूमि पर  जो 2.5  से 3.0  मीटर तक  गहरी हो, जल निकास  का साधन  हो, अच्छी  तरह से  उगाये जा  सकते हैं। 
आडू के पौधों को फूलने-फलने के लिये जाड़ों में काफी समय तक ठंडक (अभिशितलन) की आवश्यकता होती है। कम शीतलन वाली किस्मों के लिए लगभग 7.0 डिग्री से० या उससे कम तापमान पर 250 से 300 घंटे तथा अधिक शीतलन वाली किस्मों के लिए 800 घंटे से अधिक समय के लिये होना चाहिये तभी फल आते हैं। अभिशीतन पूरी न होने पर समय से पौधों पर फूल अच्छी तरह नही खिलते हैं तथा फलत प्रभावित होती है। साथ ही पौधों पर पूरे पत्ते नहीं निकल पाते। तने को अत्यधिक सूर्य की गर्मी से हानि होती है। अतः उपोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में आडू के पौधे समुद्र तल से 300 से 2000 मीटर तक की ऊँचाई पर सफलतापूर्वक उगाये जा सकते हैं। 
आवश्यक मिट्टी
आडू के  लिए हल्की  ढलान वाली  समुचित जल  निकासयुक्त भूमि  उपयुक्त है।  एक मीटर  गहरी बलुई  दोमट मृदा  उत्तम है।  यदि जल  निकास सही  हो तो  चिकनी मृदा  में भी  आडू उगाया  जा सकता  है। आडू  की सफल  खेती के  लिए मृदायें  न बहुत  अधिक उपजाऊ  हों और  न बहुत  कम उपजाऊ।  अधिक उपजाऊ  भूमि में  अधिक वानस्पितिक  वृद्वि होगी  और कम  उपजाऊ भूमि  में फलत  कम व  कम गुणवत्तायुक्त होगी। 
आडू साधारण  अमलीय (पी एच  5.8-6.8) से  न्यूट्राल भूमि  में सफल  होता है।  क्षारीय भूमि  में लोह  तत्व की  अनउपलब्धता से  पत्तियाँ पीली  पड़ कर  उपज पर  प्रतिकूल असर  डालती है।
खेत की तैयारी एवं पौध रोपाई
 रेखांकन कन्टूर  बनाकर वर्गाकार  अथवा षठ्भुजाकार  विधि में  करना चाहिए।  वर्गाकार विधि  में पौधे  से पौधे  तथा पंक्ति  से पंक्ति  के बीच  की दूरी  5-6 मीटर  रखनी चाहिए।  षठ्भुजाकार विधि  में पेड  के दूरी  5-6 मीटर  रहेगी किन्तु  पंक्ति-पंक्ति की  दूरी कम  हो जायेगी  जिससे बाग  में लगभग  15 प्रतिशत  पेड़ अधिक  आते है।  प्रत्येक गड्ढे  में 50-60 किलोग्राम सड़ी  गोबर की  खाद लगभग  उतनी ही  मिट्टी में  मिलाकर 10-15 सें०मी० की  ऊँचाई तक  भर दें।  गड्ढे में  कीड़ों के  बचाव के  लिए 500-550 ग्राम बी-एच-सी  या एल्ड्रिन  5 प्रतिशत  का चूर्ण  या 0.05 प्रतिशत क्लोरोपाइरीफास का घोल  मिला दें।  पौधे लगाते  समय गड्ढे  के बीच  से मिट्टी  को भली-भाँति  दबा दें।  इसके बाद  सिंचाई करके  थालों को  पत्तियों या  सूखी घास  से अच्छी  तरह ढक  देना चाहिये।
       
अच्छी गुणवत्ता  एवं जल्दी  फल प्राप्त  करने के  लिए आड़ू  को पॉलिहाउस  में उगाना  चाहिए (चित्र  1)। कम ओज वाले मूलवृन्तों (जैसे बादाम, चेरी  आदि)  के  प्रयोग  से  आड़ू  के  बाग  में  पेड़  सघन पद्धती पर  लगाये  जा  सकते  है।  इससे  फलत  कई  गुना  और  जल्दी  प्राप्त  हो  सकती  है (चित्र 2)।
सघन पद्धति में लगाने के लिये आडू के पेड़ों जिन्हें आडू एवं प्लम के बीजू मूलवृन्तों में तैयार किया गया है, को टाटूरा ट्रैलिस एवं हेजरो विधि में लगाकर सधाई करें । पेड़ों को 2 x 1 मिटर की दूरी पर लगा सकते हैं । वास्तव में सघन बागवानी तभी संभव है जब ऊँचाई कम करने वाले प्रभावी मूलवृन्त उपलब्ध हों । अभी तक इस तरह के मूल वृन्तों का अभाव है । उपर्युक्त सधाई की विधियों में लगाकर वृद्धि अवरोधी नियामकों जैसे कल्टार (पेक्लोब्यूट्राजोल) के प्रयोग से ऐसे बाग स्थापित किये जा सकते हैं । हिमालय की वर्षा आधारित पहाड़ियों पर ऐसे बाग स्थापित करने की तकनीकों का मूल्याकंन अभी किया जाना है ।