अरहर की खेती का सुझाव

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अरहर की खेती का सुझाव

कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा ग्राम कीरतपुर, अजयगढ़ में अरहर की उन्नत तकनीक पर किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। कृषि विज्ञान केन्द्र समन्वयक डॉ. बीएस किरार, डॉ. आरके. सिंह एवं डॉ. केपी. द्विवेदी आदि वैज्ञानिकों द्वारा कृषकों को प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान कार्यक्रम में भाजपा अध्यक्ष सतानंद गौतम, जनपद सदस्य एवं उप सरपंच उपस्थित रहे। इस मौके पर डॉ. किरार द्वारा अरहर की उन्नत किस्म राजीव लोचन की विषेषताएं और बीज को फफूंदनाशक दवा कार्बोक्सीन थायरम 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित करने की सलाह दी। इसके बाद जैव उर्वरक राइजोवियम एवं स्फु र घोलक जीवाणु से उपचारित कर शीघ्र बुवाई करें। पकी गोबर खाद उपलब्ध हो तो 30 से 40 क्विंटल प्रति एकड़ खेत में डालकर बुवाई करें। भूमि ढालू एवं असमतल होने के कारण वर्षात के पानी से खेत की उपजाऊ मिट्टी बह जाती हैं। जिससे फ सल कमजोर और उत्पादन कम मिलता है। खेतो में मेड़बंदी करने से मृदा क्षरण एवं जल प्रबंधन कार्य के साथ फ सल उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी होगी। डॉ. सिंह ने बताया, अरहर फ सल के लिये संतुलित उर्वरक में यूरिया 20 किग्रा सिंगल सुपर फास्फेट 100-125 कि.ग्रा. और म्युरेट ऑफ पोटाश 15 किग्रा प्रति एकड़ आधार रूप में बुवाई के समय देना चाहिए। खेत में दीमक की समस्या होने पर फोरेट 10 जी 4 कि.ग्रा प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत मे मिला देना चाहिए। डॉ. द्विवेदी ने बताया, अरहर की बुवाई सीडड्रिल या हल से करते समय कतार से कतार की दूरी 60-70 सेमी. और पौधा से पौधा का अंतराल 20-25 सेमी. रखना चाहिए। बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली निंदाई गुड़ाई करें।

 

भूमि की तैयारी

हल्की दोमट अथवा मध्यम भारी प्रचुर स्फुर वाली भूमि, जिसमें समुचित पानी निकासी हो, अरहर बोने के लिये उपयुक्त है। खेत को 2 या 3 बाद हल या बखर चला कर तैयार करना चाहिये। खेत खरपतवार से मुक्त हो तथा उसमें जल निकासी की उचित व्यवस्था की जावे। 

  जातियाँ :-

बीज दर- 10 से 12 किलो बीज प्रति एकड़ लगता है। शीघ्र पकने वाली जातियों के लिये 30-45 से.मी. तथा पौधों से पौधों की दूरी 10-15 से.मी. मध्यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिये 60-75 से.मी. कतार से कतार तथा पौधे से पौधे की दूरी 20-25 से.मी. रखते हैं।

किस्म
शीघ्र पकने वाली जातियां
 

औसत उपज क्विंटल प्रति एकड़
गुण

                        शीघ्र पकने वाली जातियां

आई.सी.पी. एल-151
 

120-125
8 - 9

  1. फली हरे रंग की एवं बेंगनी मूंग की धारियां होती है।
  2. दाने गोल बड़े एवं धूसर सफेद रंग के होते हैं।

पूसा-33
 
135-140
8 - 9

  1. फली मध्यम आकार की एवं फलियों पर महरुम लाल धारियां होती है।
  2. दाने लाल रंग के होते हैं।

आई.सी.पी. एल- 87
125-135
8-9

  1. फली मध्यम आकार की एवं महरुम एवं लाल रंग की धारियां होती हैं।
  2. दाना हल्के लाल रंग का मध्यम गोल होता है।

पूसा-885
140-145
9-10

  1. उक्टा के लिये के लिये सहनशील
  2. दाना मोटा

                        मध्यम पकने वाली जातियां

सी-11
190-200
6-7.5

  1. उक्टा अवरोधी

आई.सी.पी. एल 87-119
190-195
8-9

  1. फलियों पर महरुम एवं लाल धारियां होती है।
  2. दाने लाल रंग के होते हैं।

नं-148
160-180
7-8

  1. दाने भूरे लाल एवं मध्यम आकार के होते हैं।
  2. पौधे मध्यम आकार के एवं घने होते हैं।

जवाहर-4
165-175
7-8

  1. दाने भूरे लाल एवं मध्यम आकार के होते हैं।
  2. पौधे मध्यम आकार के एवं घने होते हैं।

जे.के.एम. -7
 
180-190
7-8

  1. दाने गहरे भूरे लाल रंग के मध्यम एवं गोल आकार के होते हैं।
  2. पौधे लम्बे आकार के होते हैं।

खरगोन-2
150-160
4-5

  1. दाना लाल
  2. असीमित वृध्दि वालादाना लाल

                          देर से पकने वाली जातियां

एम.ए.-3 
220-250
10-12

  1. दाने लाल रंग के मध्यम आकार के होते हैं।
  2. यह किस्म फली मक्खी के लिये सहनषील है।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार

अरहर की फसल में उन्नत किस्मों का प्रमाणित बीज 10-12 किलोग्राम एकड़ प्रति एकड़ लगता है । बीज को बीजोपचार करने के बाद ही बोये । बीजोपचार ट्रायकोडर्मा बिरिडी 10 ग्राम/किलो या 2 ग्राम थाइरम/एक ग्राम बेबीस्टोन (2:1) में मिलाकर 3 ग्राम प्रति किलो की दर से बीजोपचार करने से फफूंद नष्ट हो जाती है । बीजोपचार के उपरांत अरहर का राइजोबियम कल्चर 5 ग्राम एवं पी.एस.बी. कल्चर 5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें । बीज को कल्चर से उपचार करने के बाद छाया में सुखाकर उसी दिन बोनी करें।

बोवाई का समय एवं तरीका

 

 

अरहर की बोनी का समय वर्षा पर निर्भर करता है। अरहर की बोनी सामान्यत: जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करना चाहिए । सिंचित क्षेत्रों में जल्दी पकने वाली अरहर की बोनी जून के प्रथम सप्ताह सर द्वितिय सप्ताह में करने से अच्छी उपज मिलती है । यदि वर्षा अधिक होने से समय पर अरहर की बोनी कृषक न कर सकें तो फिर इसकी बोनी अगस्त के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है ।

उर्वरक का प्रयोग

बुवाई के समय 8 कि.ग्रा. नत्रजन, 20 कि.ग्रा. स्फुर, 8 कि.ग्रा. पोटाष व 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति एकड़ कतारों में बीज के नीचे दिया जाना चाहिये। तीन वर्ष में एक बार 10 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति एकड़ आखिरी बखरीनी पूर्व भुरकाव करने से पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी होती है। 

सिंचाई 

जहां सिंचाई की सुविधा हो वहां एक सिंचाई फूल आने पर व दूसरी फलियां बनने की अवस्था पर करने से पैदावार अच्छी होती है। 

खरपतवार प्रबंधन :-

खरपतवार नियंत्रण के लिये 20-25 दिन में पहली निदाई तथा फूल आने से पूर्व दूसरी निदाई करें। 2-3 बार खेत में कोल्पा चलाने से निदाओं पर अच्छा नियंत्रण रहता है व मिट्टी में वायु संचार बना रहता है। पेंडीमेथीलिन 500 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ बोनी के बाद प्रयोग करने से नींदा नियंत्रण होता है। निदानाषक प्रयोग के बाद एक निदाई लगभग 30 से 40 दिन की अवस्था पर करना चाहिये।

अंतरवर्तीय फसल :-

अंतरवर्तीय फसल पध्दति से मुख्य फसल की पूर्ण पैदावार एवं अंतरवर्तीय फसल से अतिरिक्त पैदावार प्राप्त होगी। मुख्य फसल में कीटो का प्रकोप होने पर या किसी समय में मौसम की प्रतिकूलता होने पर किसी फसल से सुनिष्चित लाभ होगा। साथ-साथ अंतरवर्तीय फसल पध्दति में कीटों और रोगों का प्रकोप नियंत्रित रहता है। 

अरहर / मक्का या ज्वार 2:1 कतारों के अनुपात में, (कतारों के बीच की दूरी 40 से.मी.), अरहर/मूंगफली या सोयाबीन 2:4 कतारों के अनुपात में, अरहर / उड़द या मूंग 1:2 कतारों के अनुपात में मध्य प्रदेश के उत्तम अंतवर्तीय फसल पध्दतियां हैं। 
 

पौध संरक्षण -

अ. रोग

उकटा रोग

इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। यह फ्यूजेरियम नामक कवक से फैलता है। रोग के लक्षण साधारणता फसल में फूल लगने की अवस्था पर दिखाई देते हैं। नवम्बर से जनवरी महीनों के बीच में यह रोग देखा जा सकता है। पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसमें जड़े सड़ कर गहरे रंग की हो जाती है तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की उंचाई तक काले रंग की धारियां पाई जाती है। इस बीमारी से बचने के लिये रोग रोधी जातियां जैसे सी-11, जवाहर के.एम.-7, बी.एस.एम.आर.-853, आषा आदि बोयें। उन्नत जातियों का बीज बीजोपचार करके ही बोयें। गर्मी में खेत की गहरी जुताई व अरहर के साथ ज्वार की अंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का संक्रमण कम होता है।

बांझपन विषाणु रोग:-

 यह रोग विषाणु से फैलता है। इसके लक्षण पौधे के उपरी शाखाओं में पत्तियां छोटी, हल्के रंग की तथा अधिक लगती है और फूल-फली नहीं लगती है। ग्रसित पौधों में पत्तियां अधिक लगती है। यह रोग, मकड़ी के द्वारा फैलता है। इसकी रोकथाम हेतु रोग रोधी किस्मों को लगाना चाहिये। खेत में उग आये बेमौसम अरहर के पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिये। मकड़ी का नियंत्रण करना चाहिये।

फायटोपथोरा झुलसा रोग

  रोग ग्रसित पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसकी रोकथाम हेतु 3 ग्राम मेटेलाक्सील फफूंदनाशक दवा प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। बुवाई पाल (रिज) पर करना चाहिये और मूंग की फसल साथ में लगायें।   

ब. कीट

फली मक्खी

यह फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। इल्ली अपना जीवनकाल फली के भीतर दानों को खाकर पूरा करती है एवं बाद में प्रौढ़ बनकर बाहर आती है। दानों का सामान्य विकास रुक जाता है।
मादा छोटे व काले रंग की होती है जो वृध्दिरत फलियों में अंडे रोपण करती है। अंडों से मेगट बाहर आते हैं और दानों को खाने लगते हैं। फली के अंदर ही मेगट शंखी में बदल जाती है। जिसके कारण दानों पर तिरछी सुरंग बन जाती है और दानों का आकार छोटा रह जाता है। तीन सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।
 

 फली छेदक इल्ली

छोटी इल्लियां फलियों के हरे उत्तकों को खाती है व बड़े होने पर कलियों, फूलों, फलियों व बीजों पर नुकसान करती है। इल्लिया फलियों पर टेढ़े-मेढ़े छेद बनाती है।
इस की कीट की मादा छोटे सफेद रंग के अंडे देती है। इल्लियां पीली, हरी, काली रंग की होती है तथा इनके शरीर पर हल्की गहरी पट्टियां होती है। अनुकूल परिस्थितियों में चार सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।

फल्ली का मत्कुण

 मादा प्राय: फल्लियों पर गुच्छों में अंडे देती है। अंडे कत्थई रंग के होते हैं। इस कीट के षिषु एवं वयस्क दोनों ही फली एवं दानों का रस चूसते हैं, जिससे फली आड़ी-तिरछी हो जाती है एवं दानें सिकुड़ जाते हैं। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करते हैं।

प्लू माथ 

इस कीट की इल्ली फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। प्रकोपित दानों के पास ही इसकी विष्टा देखी जा सकती है। कुछ समय बाद प्रकोपित दाने के आसपास लाल रंग की फफूंद आ जाती है।
मादा गहरे रंग के अंडे एक-एक करके कलियों व फली पर देती है। इसकी इल्लियां हरी तथा छोटै-छोटे काटों से आच्छादित रहती है। इल्लियां फलियों पर ही शंखी में परिवर्तित हो जाती है। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करती है।
 

ब्रिस्टल बीटल

ये भृंग कलियो, फूलों तथा कोमल फलियों को खाती है जिससे उत्पादन में काफी कमी आती है। यह कीट अरहर, मूंग, उड़द, तथा अन्य दलहनी फसलों पर भी नुकसान पहुंचाता है। भृंग को पकड़कर नष्ट कर देने से प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।

 कीट प्रंबधन  

 कीटों के प्रभावी नियंत्रण हेतु समन्वित प्रणाली अपनाना आवष्यक है

  कृषि कार्य द्वारा :

  • गर्मी में खेत की गहरी जुताई करेंäÆ 
  • शुध्द अरहर न बोयें 
  • फसल चक्र अपनाये
  • क्षेत्र में एक ही समय पर बोनी करना चाहिये 
  • रासायनिक खाद की अनुषंसित मात्रा का प्रयोग करें। 
  • अरहर में अंतरवर्तीय फसलें जैसे ज्वार, मक्का या मूंगफली को लेना चाहिये।

यांत्रिकी विधि द्वारा :

  • प्रकाष प्रपंच लगाना चाहिये 
  • फेरोमेन प्रपंच लगायेä 
  • पौधों को हिलाकर इल्लियां को गिरायें एवं उनकी इकट्ठा करके नष्ट करें। 
  • खेत में चिड़ियाओं के बैठने की व्यवस्था करें।

जैविक नियंत्रण द्वारा -  

  • 1. एन.पी.वी. 200 एल.ई. प्रति एकड़ / यू.वी. रिटारडेंट 0.1 प्रतिषत / गुड़ 0.5 प्रतिशत मिश्रण को शाम के समय छिड़काव करें। बेसिलस थूरेंजियन्सीस 400 ग्राम प्रति एकड़ / टिनोपाल 0.1 प्रतिषत / गुड 0.5 प्रतिषत का छिड़काव करें।

जैव-पौध पदार्थों के छिड़काव द्वारा : 

  • निंबोली सत 5 प्रतिषत का छिड़काव करें।
  • नीम तेल या करंज तेल 10-15 मि.ली. / 1 मि.ली. चिपचिपा पदार्थ (जैसे सेडोविट, टिपाल) प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • निम्बेसिडिन 0.2 प्रतिषत या अचूक 0.5 प्रतिषत का छिड़काव करें।

रासायनिक नियंत्रण द्वारा : 

  • आवश्यकता पड़ने पर ही कीटनाषक दवाओं का छिड़काव या भुरकाव करना चाहिये। 
  • फली मक्खी नियंत्रण हेतु संर्वागीण कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें जैसे डायमिथोएट 30 ई.सी. 0.03 प्रतिशत,मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. 0.04 प्रतिषत आदि।
  • फली छेदक इल्लियां के नियंत्रण हेतु- फेनवलरेट 0.4 प्रतिषत चूर्ण या क्वीनालफास 1.5 प्रतिषत चूर्ण या इंडोसल्फान 4 प्रतिषत चूर्ण का 8 से 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से भुरकाव करें या इंडोसल्फान 35 ईसी 0.7 प्रतिशत या क्वीनालफास 25 ईसी 0.05 प्रतिशत या क्लोरोपायरीफास 20 ईसी 0.6 प्रतिषत या फेन्वेलरेट 20 ईसी 0.02 प्रतिशत या एसीफेट 75 डब्ल्यू.पी. 0.0075 प्रतिशत या ऐलेनिकाब 30 ई.सी 200 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ है, या प्राफेनोफॉस 50 ईसी 400 मि.ली. प्रति एकड़ का छिड़काव करें। दोनों कीटों के नियंत्रण हेतु प्रथम छिड़काव सर्वांगीण कीटनाशक दवाई का करें तथा 10 दिन के अंतराल से स्पर्ष या सर्वांगीण कीटनाशक का छिड़काव करें। कीटनाशक के 3 छिड़काव या भुरकाव पहला फूल बनने पर, दूसरा 50 प्रतिषत फूल बनने पर और तीसरा फली बनने की अवस्था पर करना चाहिये।

  कटाई एवं गहाई :-

 जब पौधे की पत्तियां गिरने लगे एवं फलियां सूखने पर भूरे रंग की पड़ जाये तब फसल को काट लेना चाहिये। खलिहान में 8-10 दिन धूप में सुखाकर ट्रेक्टर या बैलों द्वारा दावन कर गहाई की जाती है। बीजों को 8-9 प्रतिशत नमी रहने तक सुखाकर भण्डारित करना चाहिये।

उन्नत उत्पादन तकनीकी अपनाकर अरहर की खेती करने से 6-8 क्विटल प्रति एकड़ उपज असिंचित अवस्था में और 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ उपज सिंचित अवस्था में प्राप्त की जा सकती है।