विज्ञान एवं तकनीकी समाचार

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Updated: 3 min 11 sec ago

इस साल विज्ञान की सबसे बड़ी खोज

14 December, 2017 - 13:14

आसमान में आग

अंतरिक्ष पर नज़र रखने वाले वैज्ञानिकों ने 15 फ़रवरी को एक छोटे से ग्रह को धरती के क़रीब आते देखा.

मगर इसके सुरक्षित गुज़रने के बाद दस हज़ार टन की एक अंतरिक्षीय चट्टान रूस के चेल्याविंस्क के ऊपर आसमान में जलकर राख हो गई. हालांकि उसके अवशेषों के ज़मीन पर गिरने से क़रीब एक हज़ार लोग घायल हो गए और आस-पास की कई इमारतों को नुकसान पहुंचा.

इस असाधारण घटना ने वैज्ञानिकों को क्षुद्र ग्रह के 'हमले' का अध्ययन करने का दुर्लभ संयोग दिया. इस जांच के लिए गाड़ियों के डैशबोर्ड पर लगे कैमरों को धन्यवाद देना चाहिए.

800 साल पुराना मोबाइल फोन पाया गया!

18 November, 2017 - 06:00

ऑस्ट्रिया की खुदाई में 800 साल पुराना मोबाइल फोन पाया गया! 800 ऑस्ट्रिया। यूं तो मोबाइल फोन का आविष्कार आधिकारिक रूप से आज से तकरीबन 40 साल पहले हुआ था। लेकिन ऑस्ट्रिया में पुरातत्व विभाग की खुदाई में एक मोबाइल फोन मिला है जिसके 800 साल पुराने होने का दावा किया जा रहा है।  खुदाई में जो मोबाइल फोन पाया गया है वह देखने में 1990 के दशक का लगता है जिसकी सोशल मीडिया पर जमकर चर्चा हो रही है। फोन के बटन स्फानलिपि के लगते हैं, जोकि प्राचीन समय में प्रयोग होती थी। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह फोन मेसोपोटामिया सभ्यता के लोग इस्तेमाल करते थे। इस फोन के बारे कई तरह के दावे किये जा रहे हैं, जिसमें कहा ज

पृथ्वी के भीतर हैं महासागर जाने विस्तार से

18 November, 2017 - 04:56

एक हीरे के अंदर पाई गई रहस्यपूर्ण चट्टान ने इस सवाल को अहम बनाया कि पृथ्वी की सतह के नीचे क्या-क्या छिपा है.

इस रहस्यपूर्ण चट्टान में पानी के कण मिलना महत्वपूर्ण खोज थी. ये चट्टानें हमें बताती हैं कि पृथ्वी के भीतर, सतह के 500-600 किलोमीटर नीचे सदियों पहले क्या हुआ. और वहां क्या मौजूद है.

वैज्ञानिक दशकों से इन सवालों से जूझ रहे हैं कि पृथ्वी पर पानी कैसे आया, महासागर कैसे बनें और क्या पृथ्वी की सतह के नीचे और महासागर छिपे हुए हैं?

अब तक मनुष्य ने पृथ्वी की सतह के नीचे जो सबसे गहरा गड्ढ़ा बनाया है वो 10 किलोमीटर तक ही पहुँच पाया है.

हवा से बिजली तैयार हो सकेगी

18 November, 2017 - 04:56

हवा से मुफ़्त में बिजली बनाना, एक फंतासी जैसा लगता है लेकिन व्यवसायी और पूर्व वैज्ञानिक लॉर्ड ड्रेसन ने लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूशन में एक ऐसी ही तकनीक का प्रदर्शन किया.

उनका दावा है कि फ़्रीवोल्ट नामक यह टक्नोलॉजी हवा में मौजूद तरंगों की ऊर्जा को इस्तेमाल कर बहुत कम उर्जा से चलने वाले उपकरणों जैसे सेंसरों को बिजली मुहैया कराई जा सकती है.

असल में इस टेक्नोलॉजी में हवा में 4जी और डिज़िटल टेलीविज़न की रेडियो तरंगों की ऊर्जा का इस्तेमाल होता है.