कीवी फल की खेती

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कीवी फल

डॉ.शर्मा ने बताया कि हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षत्रों जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई 900 से 1800 मीटर है काफी संभावनाएं है। किवीफल के पौधों को फलने के लिए 600 से 800 घंटे की चिल्लिंग रिक्वॉयरमेंट होती है। बसंत ऋतु में अंकुर निकलने के समय कोहरा नहीं पडऩा चाहिए। इसके अलावा तेज़ गर्मी 40 डिग्री सेल्सियस आंधी से पत्तियों फ़लों को नुकसान पहुंचता है। 

गुठलीदार फलों का बेहतर विकल्प किवी 

नौणीयूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. हरीचंद शर्मा ने बताया कि बदलते जलवायु के परिवेश में इन फलों के उत्पादन में किसानों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। गुठलीदार फलों के बगीचे काफी पुराने हो चुके है और बागवानों ने भी इस पर ध्यान देना बंद कर दिया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए पिछले दो दशकों में कीवी सोलन, सिरमौर, कुल्लू मंडी के मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प है। यह फल प्राय: अक्टूबर से दिसंबर तक पक कर तैयार हो जाता है। इस फल की भंडारण क्षमता बहुत अच्छी है। डॉ. शर्मा ने कहा कि भारत में किवीफल में किसी गंभीर रोग अथवा कीट का प्रकोप नहीं देखा है। कीटनाशकों या रसायनों का छिड़काव नहीं करना पड़ता, जिससे स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभदायक है। 

नौणी यूनिवर्सिटी में किवी फल से लदा बगीचा। 

यशपाल कपूर | सोलन

हिमाचलप्रदेश के मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में किवीफल आर्थिकी को पंख लगा सकते हैं। यहां मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में आड़ू, पलम, खुरमानी की बागबानी कर रहे हैं, यह सभी फल टिकाऊ नहीं होते। ऐसे में किवी फल आर्थिक दृष्टि से लाभदायक फल के रूप में उभर कर सामने आया है। इसके लिए नौणी यूनिवर्सिटी के फल विज्ञान विभाग ने तकनीक विकसित की है। इस तकनीक का हिमाचल ही नहीं अपितु पूर्वोत्तर भारत के राज्य जिनमें मुख्यत: अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, सिक्किम मेघालय में किवी भी लाभ उठा रहे हैं। यहां किवी की व्यावसायिक खेती की जा रही है। यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित की गई तकनीक से प्रति हैक्टेयर किवीफल के बगीचे से 6 गुणा अधिक आमदनी प्राप्त की जा सकती है। एक हैक्टेयर बगीचे से 24 लाख के आमदनी ली जा सकती है। सेब के एक हैक्टेयर में बगीचा लगाने से मात्र 8.9 लाख कमाए जा सकते हैं, जबकि सब्जी उत्पादन जिनमें मुख्यत टमाटर से मात्र 2 से 2.5 लाख तक की ही आमदनी की जा सकती है। किवी को चाइनीज़ गूज़बैरी के नाम से भी जाना जाता है। यद्यपि इस फल का मूल स्थान चीन है, लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से इसका उपयोग न्यूजीलैंड ने किया। हिमाचल प्रदेश में वर्ष 1990 के दशक में कुल्लू, मंडी, सोलन, चंबा सिरमौर जिलों में काफी बगीचे लगाए गए, लेकिन तकनीकी जानकारी के अभाव में किवीफल की बागवानी उतनी लाभकारी सिद्ध नहीं हुई, जितनी इसकी संभावनाएं थी। इसका मुख्य कारण फलों के आकार गुणवता का कम होना था जो विदेश से आयात किए गए फल की उपेक्षा कम थे। डॉ यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी नौणी सोलन के फल विज्ञान विभाग के एचओडी डॉ नरेन्द्र शर्मा ने बताया कि किवी पर यूनिवर्सिटी में दो दशकों सेें शोध कार्य किया गया। शोध में यह पाया की किवी के पौधों को 17-18 बार सिंचाई करने की आवश्यकता होती है। जिन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता कम है। वहां पौधों में घास या अन्य किसी प्रकार की पलवार (मल्चिंग) लगाने से पानी की आवश्यकता को कम किया जा सकता है। डॉ. शर्मा ने बताया कि यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के बगीचे तैयार किए गए हैं। इनमें आधुनिक तकनीकें जैसे ट्रेनिंग स्ट्रक्चरर, टपक सिंचाई, एंटी हैल नेट सोलर फैंसिंग का उपयोग किया गया है। इस विभाग में काफी मात्रा में पौधे तैयार किए गए। डॉ. एचसी शर्मा ने बताया कि यूनिवर्सिटी इस फल के ज्यादा से ज्यादा अच्छी किस्म के पौधे तैयार करके के किसानों को उपलब्ध करवाएगा ताकि इस फल को और बढावा मिल सकें। 

 

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