करौंदे की फसल में लागत शून्य और मुनाफा भरपूर

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करौंदे की फसल में लागत

करौंदा एक बहुत सहिष्णु पौधा है | यह उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में उगाया जा सकता है | लेकिन अधिक बरसात और जलमग्न भूमि इसके लिए नुकसानदायक है |

 

भूमि :-

करौंदा अनेक प्रकार की भूमि में तथा कम उपजाऊ भूमि में भी उगाया जा सकता है लेकिन अच्छी बढवार और उपज (पैदावार) के लिए अच्छी भूमि होना आवश्यक है |

 

प्रवर्धन :-

करौंदे का प्रवर्धन बीज व वानस्पतिक तरीकों,जैके कटिंग,इनारचिंग तथा लेयरिंग से कर सकते है |

 

फासला :-

फरवरी-मार्च व सितम्बर-अक्टूबर के महीने में 60 गुना 60 गुना 60 गुना सेटीमीटर के गड्ढे 3 गुना 3 मीटर की दूरी पर तैयार कर पौधे लगाने चाहिए |

 

काट-छांट :-

पौधा लगते समय इसे किसी बांस का सहारा दें ताकि इसकी बढ़वार सीधी रहे | समय-समय पर अवांछित शाखाओं को निकालते रहें | फलित पौधे को बहुधा कटाई की आवश्यकता नहीं होती फिर भ अच्छे आकर देने के लिए फालतू टहनियों की काट-छांट आवश्यक हो जाती है | रोगग्रस्त शाखाओं को निकाल दें | पुरानी शाखाओं में बदलने के लिए कटाई-छंटाई करते रहे |

 

बीच की फसल :-

पौधा लगाने के पहले वर्ष खरपतवार काफी समस्या पैदा कर सकते है | जिन्हें निराई-गुड़ाई द्वारा निकालते रहना चाहिए | करौंदे की लगातार फसल में पहले 2 वर्ष तक वर्षा में तक वर्षा में उगाई जाने वाली सब्जियों की काश्त की जा सकती है |

 

खाद एवं उर्वरक :-

करौंदा के पौधे को 15-20 किलो गोबर की गली-सड़ी खाद प्रति पौधा प्रति वर्ष दें | इसे वर्षा ऋतु के आगमन पर दल दें वर्ना पौधों की बढ़वार कमजोर पड़ जाएगी |

 

सिंचाई:-

करौंदा प्राय; कम बढ़ने वाला पौधा है | एक बार भूमि में अच्छी तरह लग जाने पर इसे पानी की आवश्यकता नहीं रहती है |

 

फलन:-

करौंदा में तृतीय वर्ष से फूल व फल आने शुरू हो जाते है तथा फरवरी के महीने में फूल आते है और फल अगस्त के महीने में पककर तैयार हो जाता है | हालांकि कच्चे फल मई मास में ही मिलने शुरू हो जाते है |

 

फलों की तुड़ाई:-

कच्चे व पके फलों की तुड़ाई की जाती है | एक ही समय पर सभी फल तोडना असम्भव है | इसे दो या तीन बार करते है फलों का रंग बदलना ही फलों की परिपक्वता की निशानी है | सामान्यत: 4-5 किलो फल प्रति पौधा लिए जा सकते है |
 

 

करौंदा की खेती के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए विडियो के लिंक पर क्लिक करें |

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करौंदा की खेती किस प्रकार करें किस्में :- 1.हरे रंग के फलों वाली 2.गुलाबी रंग के फलों वाली 3.सफ़ेद रंग के फलों वाली 4. नरेन्द्रा करोंदा-1 जलवायु:- करौंदा एक बहुत सहिष्णु पौधा है | यह उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में उगाया जा सकता है | लेकिन अधिक बरसात और जलमग्न भूमि इसके लिए नुकसानदायक है | भूमि :- करौंदा अनेक प्रकार की भूमि में तथा कम उपजाऊ भूमि में भी उगाया जा सकता है लेकिन अच्छी बढ़वार और उपज के लिए अच्छी भूमि होना आवश्यक है | प्रवर्धन :- करौंदे का प्रवर्धन बीज व वानस्पतिक तरीकों,जैके कटिंग,इनारचिंग तथा लेयरिंग से कर सकते है | फासला :- फरवरी-मार्च व सितम्बर -अक्टूबर के महीने में 60 गुना 60 गुना 60 गुना सेटीमीटर के गड्ढे 3 गुना 3 गुना मीटर की दूरी पर तैयार कर पौधे लगाने चाहिए | काट-छांट :- पौधा लगाते समय इसे किसी बांस का सहारा दे ताकि इसकी बढ़वार सीधी रहे | समय-समय पर अवांछित शाखाओं को निकालते रहें | फलित पौध को बहुधा कटाई की आवश्यकता नहीं होती फिर भी अच्छे आकार देने के लिए फालतू टहनियों की काट-छांट आवश्यक हो जाती है | रोगग्रस्त शाखाओं को निकाल दें | पुरानी शाखाओं को नई शाखाओं में बदलने के लिए कटाई-छंटाई करते रहें | बीच की फसल :- पौधा लगाने के पहले वर्ष खरपतवार काफी समस्या पैदा कर सकते है | जिन्हें निराई-गुड़ाई द्वारा निकालते रहना चाहिए | करौंदे की लगातार फसल में पहले 2 वर्ष दें | इसे वर्षा ऋतु के आगमन पर दल दें वरना पौधों की बधवार कमजोर पद जाएगी | सिंचाई :- करौंदा प्राय: कम बढ़ने वाला पौधा है एक बार भूमि में अच्छी तरह लग जाने पर इसे पानी की आवश्यकता नहीं रहती है | इसके अलावा करौंदा शुष्क जलवायु में उगने वाले पौधे की तरह व्यवहार करता है इसलिए इसको पानी की कम आवश्यकता होती है | फलन :- करौंदा में तृतीय वर्ष से फूल व फल आने शुरू हो जाते है तथा फरवरी के महीने में फूल आते है और फल अगस्त के महीने में पककर तैयार हो जाते है हालांकि कच्चे फल मई मास में ही मिलने शुरू हो जाते है | फलों की तुड़ाई:- कच्चे व पके फलों की तुड़ाई की जाती है | एक ही समय पर सभी फल तोड़ना असम्भव है | इसे दो या तीन बार करते है | फलों का रंग बदलना ही फलों की परिपक्वता की निशानी है | सामन्यत: 4-5 किलो फल प्रति पौधा लिए जा सकते हैं |

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करौंदा की उन्नत खेती कैसे करें

 

किस्में

1.हरे रंग के फलों वाली

2.गुलाबी रंग के फलों वाली

3.सफ़ेद रंग के फलों वाली

4.नरेन्द्रा करोंदा

 

जलवायु :-

करौंदा एक बहुत सहिष्णु पौधा है | यह उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में उगाया जा सकता है | लेकिन अधिक बरसात और जलमग्न भूमि इसके लिए नुकसानदायक है |

 

भूमि :-

करौंदा अनेक प्रकार की भूमि में तथा कम उपजाऊ भूमि में भी उगाया जा सकता है लेकिन अच्छी बढवार और उपज (पैदावार) के लिए अच्छी भूमि होना आवश्यक है |

 

प्रवर्धन :-

करौंदे का प्रवर्धन बीज व वानस्पतिक तरीकों,जैके कटिंग,इनारचिंग तथा लेयरिंग से कर सकते है |

 

फासला :-

फरवरी-मार्च व सितम्बर-अक्टूबर के महीने में 60 गुना 60 गुना 60 गुना सेटीमीटर के गड्ढे 3 गुना 3 मीटर की दूरी पर तैयार कर पौधे लगाने चाहिए |

 

काट-छांट :-

पौधा लगते समय इसे किसी बांस का सहारा दें ताकि इसकी बढ़वार सीधी रहे | समय-समय पर अवांछित शाखाओं को निकालते रहें | फलित पौधे को बहुधा कटाई की आवश्यकता नहीं होती फिर भ अच्छे आकर देने के लिए फालतू टहनियों की काट-छांट आवश्यक हो जाती है | रोगग्रस्त शाखाओं को निकाल दें | पुरानी शाखाओं में बदलने के लिए कटाई-छंटाई करते रहे |

 

बीच की फसल :-

पौधा लगाने के पहले वर्ष खरपतवार काफी समस्या पैदा कर सकते है | जिन्हें निराई-गुड़ाई द्वारा निकालते रहना चाहिए | करौंदे की लगातार फसल में पहले 2 वर्ष तक वर्षा में तक वर्षा में उगाई जाने वाली सब्जियों की काश्त की जा सकती है |

 

खाद एवं उर्वरक :-

करौंदा के पौधे को 15-20 किलो गोबर की गली-सड़ी खाद प्रति पौधा प्रति वर्ष दें | इसे वर्षा ऋतु के आगमन पर दल दें वर्ना पौधों की बढ़वार कमजोर पड़ जाएगी |

 

सिंचाई:-

करौंदा प्राय; कम बढ़ने वाला पौधा है | एक बार भूमि में अच्छी तरह लग जाने पर इसे पानी की आवश्यकता नहीं रहती है |

 

फलन:-

करौंदा में तृतीय वर्ष से फूल व फल आने शुरू हो जाते है तथा फरवरी के महीने में फूल आते है और फल अगस्त के महीने में पककर तैयार हो जाता है | हालांकि कच्चे फल मई मास में ही मिलने शुरू हो जाते है |

 

फलों की तुड़ाई:-

कच्चे व पके फलों की तुड़ाई की जाती है | एक ही समय पर सभी फल तोडना असम्भव है | इसे दो या तीन बार करते है फलों का रंग बदलना ही फलों की परिपक्वता की निशानी है | सामान्यत: 4-5 किलो फल प्रति पौधा लिए जा सकते है |
 

 

करौंदा की खेती के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए विडियो के लिंक पर क्लिक करें |

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अमरूद के बागों के लिए ख्यात चिरईगांव अब करौंदे की खेती के लिए भी जाना जाने लगा है। इसकी खेती किसानों को मालामाल कर रही है। आचार व मुरब्बा के स्वाद की ख्वाहिश किसानों, व्यापारियों व खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े उद्यमियों के चेहरे पर खुशियां बिखेर रही है। हालांकि इस सत्र में कम बरसात होने से करौंदे की खेती करने वाले किसान चिंतित जरूर हुए लेकिन मांग ने इसकी कीमत बढ़ा दी। परिणाम हुआ कि कुछ कम उत्पादन के बाद भी किसानों को उचित कीमत मिल गई।

कीमत अच्छी मिली : चिरईगांव प्रतिनिधि के अनुसार वर्तमान में करौंदा लगभग 3700 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक रहा है। कम उत्पादन के बाद भी प्रति बीघा लगभग 75000 रुपये की आय मिल रही है। पिछले वर्ष उत्पादन ठीक था लेकिन कम कीमत से लागत खर्च निकलना कठिन था। अबकी उत्पादन तो मौसम की भेंट जरूर चढ़ा लेकिन कीमत अच्छी मिल गई। करौंदे की तोड़ाई महिला मजदूरों के लिए आय का स्त्रोत बनी और 150 रुपये प्रतिदिन की दर से उन्हें मजदूरी मिल रही है।

लग रही मंडी : चिरईगांव में खरीद के लिए मंडी लग रही है। व्यापारी पहुंच रहे हैं। दुर्गा प्रसाद बताते हैं कि प्रतिदिन औसतन 80 से 100 कुंतल तक करौंदे की आवक है। सीवों, बरियासनपुर, दीनापुर, गौराकलां, रुस्तमपुर, चिरईगांव बराई आदि गांवों मं 200 बीघे से अधिक क्षेत्रफल में करौंदा लगा है। करौदा बाग मालिक गोकुलचंद, कैलाश, दिलीप, सुरेंद्र आदि कहते हैं कि एक बीघे में तोड़ाई पर लगभग 15 से 18 हजार रुपये तक खर्च हो रहे हैं। खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े अजय मौर्या कहते हैं कि करौंदे की कीमत चढ़ी है। कच्चे माल की कीमत वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ी है।

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करौंदा का प्रयोग

करौंदे का फल
सर्प के काटने पर करौंदे की जड़ को पानी में उबालकर क्वाथ करें। फिर इस क्वाथ को सर्प काटे रोगी को पिलाने से लाभ होता है।
घाव के कीड़ों और खुजली पर करौंदे की जड़ निकाल कर पानी में साफ़ धोकर उसे पानी के साथ महीन पीस कर फिर तेल में डालकर खूब पकायें, फिर इस तेल का प्रयोग घाव के कीड़ों और खुजली पर करने से फायदा पहुँचता है।
ज्वर आने पर करौंदे की जड़ का क्वाथ बनाकर देने से लाभ मिलता है।
खांसी में करौंदे के पत्‍तों के अर्स को निकालकर उसमें शहद मिलाकर चाटना श्रेष्ठ है।
जलंदर रोग में करौंदों का शर्बत, हर दिन एक तोला दूसरे दिन दो तोला तीसरे दिन तीन तोला इसी प्रकार एक हफ्ते तक एक तोला रोज बढ़ाते जाए। एक हफ्ते के भीतर लाभ मिलना शुरू हो जायेगा।
करौंदा का प्रयोग मूंगा व चांदी की भस्म बनाने में भी किया जाता है। मूंगा भस्म बनाने के लिये कच्चे करौंदों को लेकर बारीक पीसें फिर उसकी भली भांति लुगदी बनाकर उस लुगदी में मूगों को रखें फिर उस लुगदी के ऊपर सात कपट मिट्टी कर, उपलों की आग में रखकर फूंके। पहले मन्दाग्नि, बीच में मध्यम तीक्ष्ण अग्नि दें तो मूंगा भस्म बन जायेगी।
चांदी की भस्म करने के लिये करौंदों की लुग्दी बनाकर ऊपर की विधि द्वारा सही सम्पुट बनाकर फूकें। इस प्रकार इक्कीस बार फूंकने पर चांदी की भस्म बनेगी।
 

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करोंदा के गुण
कच्चा करौंदा खट्‌टा और भारी होता है। प्यास को शान्त करने में अति उत्तम है। रक्‍त पित्त को हरता है, गरम तथा रुचिकारी होता है। पका करौंदा, हल्का मीठा रुचिकर और वातहारी होता है।
रंग - करोंदा का रंग सफेद, स्याह, सुर्ख और हरा होता है।
स्वाद - करोंदा का स्वाद खट्टा होता है।
स्वभाव - करोंदा की तासीर गरम होती है।
हानिकारक - करोंदा रक्त पित्त और कफ को उभारते है।
दोषों को दूर करने वाला - करोंदा में व्याप्त दोषों को नमक, मिर्च और मीठे पदार्थ दूर हो जाते हैं।
 

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उपयोग
कच्चे करौंदे का अचार बहुत अच्छा होता है। इसकी लकड़ी जलाने के काम आती है।
एक विलायती करौंदा भी होता है, जो भारतीय बगीचों में पाया जाता है। इसका फल थोड़ा बड़ा होता है और देखने में सुन्दर भी। इस पर कुछ सुर्खी-सी होती है। इसी को आचार और चटनी के काम में ज्यादा लिया जाता है।
फलों के चूर्ण के सेवन से पेट दर्द में आराम मिलता है। करोंदा भूख को बढ़ाता है, पित्त को शांत करता है, प्यास रोकता है और दस्त को बंद करता है। ख़ासकर पैत्तिक दस्तों के लिये तो अत्यन्त ही लाभदायक है।
सूखी खाँसी होने पर करौंदा की पत्तियों के रस का सेवन लाभकारी होता है।
पातालकोट में आदिवासी करौंदा की जड़ों को पानी के साथ कुचलकर बुखार होने पर शरीर पर लेपित करते है और गर्मियों में लू लगने और दस्त या डायरिया होने पर इसके फ़लों का जूस तैयार कर पिलाया जाता है, तुरंत आराम मिलता है।
खट्टी डकार और अम्ल पित्त की शिकायत होने पर करौंदे के फलों का चूर्ण काफ़ी फ़ायदा करता है, आदिवासियों के अनुसार यह चूर्ण भूख को बढ़ाता है, पित्त को शांत करता है।
करोंदा के फल को खाने से मसूढ़ों से खून निकलना ठीक होता है, दाँत भी मजबूत होते हैं। फलों से सेवन रक्त अल्पता में भी फ़ायदा मिलता है।