कुंदुरी की खेती

कुंदुरी की खेती

कुंदरू को गर्म और आद्र जलवायु की आवश्यकता होती है पहले इसे प. बंगाल और उ,प्र. के  पूर्वी जिलों में उगाया जाता था किन्तु अब इसे नई विधिया अपनाकर हर सिंचित क्षेत्र में सुगमता से उगाया जा सकता है कुंदरू की खेती उन सभी क्षेत्रों में सफलता पूर्वक की जा सकती है जहां पर औसत वार्षिक वर्षा १००-१५० से.मि. तक होती है |

भूमि :-

भूमि का चुनाव :-

कीवी फल की खेती

कीवी फल

डॉ.शर्मा ने बताया कि हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षत्रों जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई 900 से 1800 मीटर है काफी संभावनाएं है। किवीफल के पौधों को फलने के लिए 600 से 800 घंटे की चिल्लिंग रिक्वॉयरमेंट होती है। बसंत ऋतु में अंकुर निकलने के समय कोहरा नहीं पडऩा चाहिए। इसके अलावा तेज़ गर्मी 40 डिग्री सेल्सियस आंधी से पत्तियों फ़लों को नुकसान पहुंचता है। 

गुठलीदार फलों का बेहतर विकल्प किवी 

किन्नू की खेती

उत्तर भारत में नीम्बूवर्गीय फलों में किन्नू की खेती प्रमुख है | इसकी खेती हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व हिमाचल प्रदेश में की जाती है | किन्नू स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है | इसमें विटामिन सी के आलावा विटामिन ए, बी तथा खनिज तत्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं | किन्नू अधिक उत्पादन देने वाली नींबू वर्गीय फलों की संकर किस्म है | इसका रस खून बढ़ने , हड्डियों की मजबूती तथा पाचन में लाभकारी होता है | इसमें खटास व मिठास का अच्छा संतुलन होता है | फल जनवरी में पकता है | इसका उत्पादन 80-100 क्विंटल प्रति एकड़ है | पौधे तैयार करना : पौधे लगाने का समय : गड्ढों में लगायें पौधे : उर्वरकों का उचित इस्तेमा

करौंदे की फसल में लागत शून्य और मुनाफा भरपूर

करौंदे की फसल में लागत

करौंदा एक बहुत सहिष्णु पौधा है | यह उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में उगाया जा सकता है | लेकिन अधिक बरसात और जलमग्न भूमि इसके लिए नुकसानदायक है |

 

भूमि :-

करौंदा अनेक प्रकार की भूमि में तथा कम उपजाऊ भूमि में भी उगाया जा सकता है लेकिन अच्छी बढवार और उपज (पैदावार) के लिए अच्छी भूमि होना आवश्यक है |

 

प्रवर्धन :-

करौंदे का प्रवर्धन बीज व वानस्पतिक तरीकों,जैके कटिंग,इनारचिंग तथा लेयरिंग से कर सकते है |

 

फासला :-

करेले की सही खेती करने की विधि

करेले की सही खेती करने की विधि

बुआई का समय } उत्तर भारत में इसकी बिजाई फरवरी व मार्च के अलावा जून व जुलाई में की जा सकती है। 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर डाला जाता है। नालियों के बीच 1.5 मीटर एवं पौधों के बीच 1 मीटर की दूरी होनी चाहिए।

खाद }

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